ब्रिटिश शासन के सही चरित्र की पहचान
नरमपंथी राष्ट्रवादियों की राजनीति इस विश्वास पर आधारित थी कि ब्रिटिश शासन को अंदर से सुधारा जा सकता है । लेकिन राजनीतिक और आर्थिक प्रश्नों से संबंधित ज्ञान जब फैला धीरे - धीरे यह विश्वास टूट गया । इसके लिए काफी बड़ी हद तक नरमपंथियों का आंदोलन स्वयं उत्तरदायी था । राष्ट्रवादी लेखकों और आंदोलनकारियों ने जनता की निर्धनता का दोषी ब्रिटिश शासन को ठहराया । राजनीतिक रूप से चेतन भारतीयों को विश्वास था कि ब्रिटिश शासन का उद्देश्य भारत का आर्थिक शोषण करना , अर्थात भारत की संपत्ति से इंग्लैंड को समृद्ध बनाना है । उन्हें महसूस हुआ कि जब तक भारतीयों द्वारा नियंत्रित और संचालित कोई सरकार ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जगह नहीं ले लेती , आर्थिक क्षेत्र में भारत शायद ही कुछ प्रगति कर सके । राष्ट्रवादियों ने खासकर यह भी देखा कि भारत के उद्योग तब तक फल - फूल नहीं सकते जब तक कि उन्हें सुरक्षा और प्रोत्साहन देने वाली कोई भारतीयों की सरकार न हो । भारत में 1896 से 1900 के बीच जो भयानक अकाल फूटे और जिनमें 90 लाख से ऊपर लोग मरे , वे जनता की दृष्टि में विदेशी शासन के आर्थिक दृष्परिणामों के जीते - जागते प्रतीक थे । 1892 और 1965 के बीच घटित राजनीतिक घटनाओं ने भी राष्ट्रवादियों को निराश करके उन्हें और भी उग्र राजनीति के बारे में सोचने को बाध्य किया वर्ष 1892 का इंडियन कौंसिल एक्ट , जिसका वर्णन हम पहले कर चुके हैं , घोर निराशा का कारण सिद्ध हुआ । दूसरी ओर , जनता को जो थोड़े से राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे , उन पर भी हमले किए गए । वर्ष 1898 में एक कानून बनाया गया जिसमें विदेशी शासन के प्रति असंतोष की भावना फैलाने को अपराध घोषित किया गया । वर्ष 1899 में कलकत्ता नगर निगम में भारतीय सदस्यों की संख्या घटा दी गई , 1904 में इंडियन आफिशियल सीक्रेट्स एक्ट बना जिसने प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया । व 1897 में नाटू भाइयों को बिना मुकद्दमा चलाए देशबाहर कर दिया गया और उन भी जनता को नहीं बतलाया गया । उसी वर्ष लोकमान्य तिलक और दूसरे समाचारपत्रे - संपादकों को विदेशी सरकार के प्रति जनता को भड़काने के आरोप में लंबी - लंबी जेल सजाएं दी गईं । इन सबसे जनता को लगा कि सरकार व्यापक राजनीतिक अधिकार देने के बजाए उन्हें मिले थोड़े से अधिकार भी छीने ले रही है । लार्ड कर्जन के कांग्रेस विरोधी दृष्टिकोण ने अधिकाधिक लोगों को विश्वास दिलाया कि भारत में ब्रिटिश शासन के रहते राजनीतिक और आर्थिक प्रगति की आशा करना व्यर्थ है । यहां तक कि नरमपंथी नेता गोखले को भी शिकायत थी कि नौकरशाही खुलकर स्वार्थी और राष्ट्रीय आकांक्षाओं की शत्रु बनती जा रही है । सामाजिक - सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी ब्रिटिश शासन अब प्रगतिशील नहीं रहा था । प्राथमिक और तकनीकी शिक्षा में कोई प्रगति नहीं हो रही थीं । साथ ही अधिकारीगणं उच्च शिक्षा के प्रति शंकित हो रहे थे और देश में उसके प्रसार में बाधा डालने की कोशिश तक कर रहे थे । वर्ष 1904 के भारतीय विश्वविद्यालय कानून से राष्ट्रवादियों को लगा कि भारत के विश्वविद्यालयों पर और भी सख्तं सरकारी नियंत्रण स्थापित करने तथा उच्च शिक्षा का प्रसार रोकने का प्रयास किया जा रहा है । इस तरह अधिकाधिक संख्या में भारतीयों को विश्वास होता जा रहा था कि देश की आर्थिक , राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रगति के लिए स्वशासन आवश्यक है । और राजनीतिक पराधीनता का मतलब भारतीय जनता के विकास का अवरुद्ध होना है ।
आत्मसम्मान और आत्मविश्वासु का परसार
19 वीं सदी के अंत तक भारतीय राष्ट्रवादियों का विश्वास और आत्मसम्मान बहुत बड़ा था । उन्हें अपना शासन आप कर सकने तथा देश का विकास कर सकने की अपनी क्षमता में विश्वास हो चुका था । तिलक , अरविंद घोष और बिपिनचंद्र पाल जैसे नेताओं ने राष्ट्रवादियों को आत्मविश्वास का संदेश दिया और उनसे आग्रह किया कि वे भारतीय जनता के चरित्र व क्षमताओं पर भरोसा करें । उन्होंने जनता को बताया कि उनकी दुर्दशा का हुल उनके अपने हाथों में है और इसके लिए उन्हें निर्भय और बलवान होना चाहिए । स्वामी विवेकानंद कोई राजनीतिक नेता न थे , मगर यह संदेश उन्होंने बार - बार दिया । उन्होंने घोषणा की : दुनिया में अगर कोई पाप है तो वह निर्बलता है । निर्बलता का त्याग करो ; निर्बलता पाप है और निर्बलता मृत्यु है सत्य की कसौटी यह है कोई भी वस्तु अगर तुम्हें शारीरिक , बौद्धिक और आध्यात्मिक दृष्टि से निर्बल बनाती है तो उसे विष समझ उसका त्याग करो कि उसमें कोई जीवन नहीं है , और वह सत्य नहीं हो सकती । उन्होंने जनता से यह भी कहा कि वह अतीत के महिमामंडन के भरोसे जीना छोड़ें और मर्दों की तरह भविष्य का निर्माण करें उन्होंने कहा , " हे भगवान , हमारा यह देश अतीत के ऊपर अपनी शाश्वत निर्भरता से कब मुक्त होगी ? आत्मप्रयास में इस विश्वास के कारण राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार करने की आकांक्षा भी जागी । यह विचार फैला कि अब राष्ट्रवाद के उद्देश्य को ऊंचे वर्गों के थोड़े से शिक्षित भारतीयों तक अब और सीमित नहीं रहना चाहिए । इसके बजाए , जनता की राजनीतिक चेतना को उभारा जाना चाहिए । उदाहरण के लिए , स्वामी विवेकानंद ने लिखा " भारत की एकमात्र आशा उसकी जनता है । ऊंचे वर्ग शारीरिक और नैतिक दृष्टि से मृतप्राय हैं । यह महसूस किया जाने लगा था कि स्वाधीनता पाने के लिए जो व्यापक बलिदान आवश्यक है वह केवल जनता ही कर सकती है ।
शिक्षा और बेरोजगारी में वृद्धि
19वीं सदी के अंत तक शिक्षित भारतीयों की संख्या में स्पष्ट वृद्धि हुई थी । इसका एक बड़ा भाग प्रशासन में बहुत कम वेतन पर काम कर रहा था और दूसरे बहुत से लोग बेरोजगार घूम रहे थे । अपनी आर्थिक स्थिति के कारण ये लोग ब्रिटिश सरकार के चरित्र को आलोचनात्मक दृष्टि से देखने लगे । उनमें से अनेक उग्र राष्ट्रवादी नीतियों से आकर्षित हुए । इससे भी महत्त्वपूर्ण था शिक्षा - प्रसार का विचारधारात्मक पक्ष शिक्षित भारतीयों की संख्या जितनी बढ़ी , उतना ही लोकतंत्र , राष्ट्रवाद और आमूल परिवर्तन , के पश्चिमी विचारों का प्रभाव भी फैला ये शिक्षित भारतीय उग्र राष्ट्रवाद के बेहतरीन प्रचारक और अनुयायी सिद्ध हुए । इसके दो कारण थे - वे कम वेतन पाने वाले या बेरोजगार थे , और साथ ही आधुनिक विचार प्रणाली और राजनीति की तथा यूरोपीय और विश्व इतिहास की शिक्षा भी उन्हें मिली थी ।
अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव
इस काल की अनेक विदेशी घटनाओं ने भी भारत में उग्र राष्ट्रवाद के विकास को प्रोत्साहित किया । वर्ष 1868 के बाद एक आधुनिक जापान के उदय ने दिखा दिया कि एक पिछड़ा हुआ एशियाई देश भी बिना किसी पश्चिमी नियंत्रण के अपना विकास कर सकता है । कुछ ही दशकों के काले में जापान के नेताओं ने अपने देश को पहले दर्जे की औद्योगिक और सैनिक शक्ति बना दिया था , व्यापक प्राथमिक शिक्षा का आरंभ किया था और एक सक्षम और आधुनिक प्रशासन खड़ा किया था । वर्ष 1896 में इथियोपिया के हाथों इटली की सेना तथा वर्ष 1905 में जापान के हाथों रूस की हार ने यूरोपीय श्रेष्ठता के भ्रम को तोड़कर रख दिया । एशिया में हर जगह एक छोटे से शियाई देश के हाथों यूरोप की सबसे बड़ी सैनिक शक्ति की पराजय की खबर को लोगों ने उत्साह के साथ सुना । 18 जून , 1905 को ' कराची क्रोनिकल नामक समाचारपत्र ने जनता की भावनाओं को इस प्रकार व्यक्त किया जो कुछ एक एशियाई देश ने किया है वह दूसरे भी कर सकते हैं अगर जापान रूस की धुनाई कर सकता है तो भारत भी उतनी ही आसानी से इंग्लैंड को धुन सकता है आइए , हम अंग्रेजों के बीच जापान के बराबर अपना स्थान ग्रहण करें । आयरलैंड , रूस , मिस्र , तुर्की और जापान के क्रांतिकारी आंदोलनों तथा दक्षिण अफ्रीका के बोअर युद्ध ने भारतीयों को विश्वास दिला दिया कि अगर जनता एकजुट और बलिदान के लिए तैयार हो तो शक्तिशाली निरंकुश सरकारों को भी चुनौती दे सकती है । जिस बात की सबसे अधिक आवश्यकता थी वह थी देशभक्ति और आत्मबलिदान की भावना ।
उग्र राष्ट्रवादी विचारसंप्रदाय - का अस्तित्व
राष्ट्रीय आंदोलन के लगभग आरंभ से ही उग्र राष्ट्रवाद का एक संप्रदाय देश में मौजूद था । इस संप्रदाय के प्रतिनिधि बंगाल में राजनारायण बोस और अश्विनीकुमार दत्त तथा महाराष्ट्र में विष्णु शास्त्री चिपलुंकर जैसे नेता थे । इस संप्रदाय के सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि बाल गंगाधर तिलक थे जिन्हें आम तौर पर लोकमान्य तिलक कहते हैं । उनका जन्म 1856 में हुआ था । बंबई विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद से ही उन्होंने पूरा जीवन देश सेवा के लिए समर्पित कर दिया । वर्ष 1880 के बाद के दशक में उन्होंने न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना में भाग लिया ; यही स्कूल बाद में फसन कालेज के नाम से प्रसिद्ध हुआ । उन्होंने अंग्रेजी में ' मरहठा तथा मराठी में ' केसरी नामक पत्रों की स्थापना की । वर्ष 1889 से वे ' केसरी का संपादन करने लगे और इस पत्र के पृष्ठों में वे राष्ट्र कद का प्रचार करने लगे । उन्होंने जनता को भारत की स्वाधीनता के लिए साहसी , स्वावलंबी और निःस्वार्थ योद्धा होने का पाठ पढ़ाया । 1893 में उन्होंने एक परंपरागत धार्मिक उत्सव , अर्थात गणपति उत्सव का उपयोग गीतों और भाषणों के द्वारा राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार के लिए करना आरंभ कर दिया । वर्ष 1895 में उन्होंने शिवाजी उत्सव का आयोजन आरंभ किया । इसका उद्देश्य महाराष्ट्रीय युवकों के आगे अनुकरण के लिए शिवाजी का उदाहरण सामने रखकर उनमें राष्ट्रवाद की भावना पैदा करना था । वर्ष 1896-97 में उन्होंने महाराष्ट्र में कर न चुकाने का अभियान चलाया । उन्होंने महाराष्ट्र के अकाल पीड़ित किसानों से कहा कि अगर उनकी फसल चौपट हो जाए तो वे मालगुजारी न दें । जब सरकार के खिलाफ घृणा और असंतोष भड़काने के आरोप में अधिकारियों ने उन्हें 1897 में गिरफ्तार किया तो उन्होंने दिलेरी और बलिदान का एक शानदार उदाहरण सामने रखा । उन्होंने सरकार से क्षमा मांगने से इंकार कर दिया जिस पर उन्हें 18 महीनों की कड़ी कैद की सजा हुई । इस तरह वे आत्मबलिदान की नई राष्ट्रीय भावना के जीते जागते प्रतीक बन गए । 20 वीं सदी के आरंभ में उग्र राष्ट्रवादी संप्रदाय को एक अनुकूल राजनीतिक वातावरण प्राप्त हुआ । अब इसके समर्थक भी राष्ट्रीय आंदोलन के दूसरे चरण का नेतृत्व करने के लिए आगे बढ़े । तिलक के अलावा उग्र राष्ट्रवाद के दूसरे महत्त्वपूर्ण नेता विपिनचंद्र पाल , अरविंद घोष और लाला लाजपतराय थे । उग्र राष्ट्रवादियों के कार्यक्रम के विशिष्ट राजनीतिक पहलू इस प्रकार थे । उनका मत था कि भारतीयों को मुक्ति स्वयं अपने प्रयासों से प्राप्त करनी होगी तथा उन्हें अपनी पतित स्थिति से उबरने के प्रयल करने होंगे । उन्होंने घोषणा की कि इस कार्य के लिए बड़े - बड़े बलिदान करने होंगे और तकलीफें सहनी होंगी । उनके भाषण , लेख और राजनीतिक कार्य दिलेरी और आत्मविश्वास से भरपूर थे और अपने देश की भलाई के लिए किसी भी व्यक्तिगत बलिदान को कम समझते थे । भारत अंग्रेजों के " कृपापूर्ण मार्गदर्शन और नियंत्रण में प्रगति कर सकता है , इसे मानने से उन्होंने इंकार कर दिया । वे विदेशी शासन से दिल से नफरत करते थे , और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि राष्ट्रीय आंदोलन का लक्ष्य स्वराज या स्वाधीनता है । उन्हें जनता की शक्ति में असीम विश्वास था और उनकी योजना जनता की कार्रवाई के द्वारा स्वराज्य प्राप्त करने की थी । इसलिए उन्होंने जनता के बीच राजनीतिक कार्य पर और जनता की सीधी राजनीतिक कार्रवाई पर जोर दिया ।
अशिक्षित नेतृत्व
1905 तक भारत में ऐसे अनेक नेता थे जो पीछे के काल में राजनीतिक आंदोलनों के मार्गदर्शन तथा राजनीतिक संघर्षों के नेतृत्व संबंधी बहुमूल्य अनुभव प्राप्त कर चुके थे । राजनीतिक कार्यकर्ताओं की एक प्रशिक्षित टुकड़ी के बिना राष्ट्रीय आंदोलन को एक उच्चतर राजनीतिक स्तर तक ले जाना बहुत कठिन होता।
बंगाल का विभाजन ( बंग - भंग )
इस तरह 1905 में जब बंगाल को दो टुकड़ों में बांट दिया गया तब तक उग्र राष्ट्रवाद के उदय की परिस्थितिया विकसित हो चुकी थीं । इसी के साथ भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का दूसरा चरण आरंभ होता है । 20 जुलाई , 1905 को लार्ड कर्जन ने एक आज्ञा जारी करके बंगाल को दो भागों में बाट दिया । पहले भाग में पूर्वी बंगाल और असम थे और उसकी आबादी 31 करोड़ थी , जबकि दूसरे आर में , शेष बंगाल था और उसकी जनसंख्या 54 करोड़ थी जिसमें 18 करोड़ बंगाली और 36 करोड़ बिहारी और उड़िया थे । तर्क यह दिया था कि बंगाल का प्रांत इतना बड़ा था कि एक प्रांतीय सरकार द्वारा उसका प्रशासन चला सकना असंभव था । लेकिन जिन अधिकारियों ने यह योजना तैयार की उनके दूसरे , राजनीतिक उद्देश्य भी थे । बंगाल तब भारतीय राष्ट्र विवाद का केंद्र माना जाता था और इस कदम के द्वारा अधिकारीगण बंगाल में राष्ट्रवाद के प्रसार को रोकना चाहते थे । भारत सरकार के गृहसचिव रिसले ने 6 दिसंबर , 1904 को एक अधिकारिक टिप्पणी में लिखा : एकजुट बंगाल अपने आप में एक शक्ति है । बंगाल अगर विभाजित हो तो सभी भागों की दिशाएं अलग - अलग होंगी । यही बात कांग्रेस के नेता महसूस करते हैं , उनकी आशंकाएं पूरी तरह सहीं हैं और इस योजना का महत्त्व इसी में हैं हमारा एक उद्देश्य हमारे शासन के विरोधियों को तोड़ना और इस प्रकार उन्हें कमजोर करना है । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और बंगाल के राष्ट्रवादियों ने विभाजन का जमकर विरोध किया । बंगाल के भीतर भी जमींदार , व्यापारी , वकील , छात्र , नगरों के गरीब लोग और स्त्रियां तक , साज के विभिन्न वर्ग अपने प्रांत के विभाजन के विरोध में स्वतःस्फूर्त ढंग से उठ खड़े हुए राष्ट्रवादियों ने बंगाल के विभाजन को एक प्रशासनीय उपाय ही नहीं , बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के लिए एक चुनौती समझा । उन्होंने इसे बंगालको क्षेत्रीय और धार्मिक आधार पर बांटने का प्रयासमाना ; धार्मिक आधार पर इसलिए कि पूर्वी भाग में मुसलमानों और पश्चिमी भाग में हिंदुओं का बहुमत था । उन्होंने समझा कि इस प्रकार बंगाल में राष्ट्रवाद को कर्मजोर और नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है । इससे बंगाली भाषा और संस्कृति को जबर्दस्त धक्का लगा । उनका तर्क था कि प्रशासन में कुशलता लाने के लिए हिंदी भाषी बिहार और उड़िया भाषी उड़ीसा को प्रांत के बंगाली भाषी क्षेत्र से अलग किया जा सकता है । इसके लिए सरकार ने यह कदम जनमत की पूरी तरह उपेक्षा आधुनिक भारत करके उठाया था । विभाजन के खिलाफ बंगाल के विरोध की तीव्रता का कारण यह कि इसने एक बहुत संवेदनशील व साहसी जनता की भावनाओं को चोट पहुंचाई थी ।
वैशअंग - विरोधी- आंदोलन
बंगभंग - विरोधी- आंदोलन
स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन बंगाल के पूरे राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रयासों के कारण था , न कि आंदोलन के किसी एक भाग के । आरंभ में इसके प्रमुखतम नेता सुरेंद्रनाथ बनर्जी और कृष्ण कुमार मित्र जैसे नरमपंथी नेता थे , मगर बाद में इसका नेतृत्व उग्र और क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों ने संभाल लिया वास्तव में आंदोलन के दौरान नरमपंथी और उग्रं राष्ट्रवादियों , दोनों ने एक दूसरे से सहयोग किया । J विभाजन - विरोधी आंदोलन 7 अगस्त 1905 को आरंभ हुआ । उस दिन कलकत्ता के टाउनहाल में विभाजन के खिलाफ एक बहुत बड़ा प्रदर्शन हुआ इस्र सभा के बाद प्रतिनिधि आंदोलन को फैलाने के लिए पूरे प्रांत में फैल गए । विभाजन 16 अक्तूबर , 1905 को लागू किया गया । आंदोलन के नेताओं ने इस दिन को पूरे बंगाल में शोक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की । उस दिन लोगों ने उपवास रखे । कलकत्ता में हड़ताल हुई । लोग बहुत तड़के ही नंगे पैर चलकर गंगा में स्नान करने पहुंचे । इस अवसर के लिए रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपना प्रसिद्ध गीत “ आमार सोनार बांग्ला लिखा जिसे सड़कों पर जलूसों में शामिल जनता गाती थी । बाद में इस गीत को बंगलादेश ने 1971 में अपनी मुक्ति के बाद अपने राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया । कलकत्ता की सड़कें ' वंदे मातरम की आवाज से गुंज उठीं और यह गीत रातों - रात बंगाल का राष्ट्रीय गान बन गया । बाद में यही पूरे राष्ट्रीय आंदोलन का राष्ट्रगान बन गया । रक्षाबंधन के उत्सव का एक नए ढंग से उपयोग किया गया । बंगालियों और बंगाल के दो टुकड़ों की अटूट एकता के प्रतीक के रूप में हिंदू मुसलमानों ने एक - दूसरे की कलाइयों पर राखियां बांधीं दोपहर को एक बहुत बड़ा प्रदर्शन किया और वयोवृद्ध नेता आनंदमोहन बोस ने बंगाल की अटूट एकता जतलाने के लिए फेडरेशन हाल की बुनियाद रखी । इस अवसर पर उन्होंने 50,000 लोगों की सभा को संबोधित किया ।
स्वदेशी और बहिष्कार
बंगाल के नेताओं को लगा कि केवल प्रदर्शनों , सार्वजनिक सभाओं और प्रस्तावों से शासकों पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ने वाला नहीं है । इसके लिए और भी सकारात्मक उपाय करने होंगे जिनसे जनता की भावनाओं की तीव्रता का अच्छी तरह पता , चले । इसका परिणाम था स्वदेशी और बहिष्कार । पूरे बंगाल में जनसभाएं की गईं जिनमें स्वदेशी अर्थात् वह घोषना पत्र जो बंगाल विभाजन के विरुद्ध पढ़ा जाता था भारतीय वस्तुओं का उपयोग तथा ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार के निर्णय किए और शपथ लिए गए । अनेक जगहों पर विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई और विदेशी कपड़े बेचने वाली दुकानों पर धरने दिए गए । स्वदेशी आंदोलन को व्यापक सफलता मिली । सुरेंद्रनाथ बनर्जी के अनुसारस्वदेशीवाद जब शक्तिमान था तब उसने हमारे सामाजिक व पारिवारिक जीवन के पूरे ताने - बाने को प्रभावित किया । अगर विवाहों में ऐसी विदेशी वस्तुएं उपहार में दी जाती जिनके समान वस्तुएं देश में बन सकती हों , तो वे लौटा दी जाती थीं । पुरोहित अक्सर ऐसे समारोहों में धार्मिक कार्य करने से इंकार कर देते जिनमें ईश्वर को भेंट में विदेशी वस्तुएं दी जाती थीं । जिन उत्सवों में विदेशी नमक या विदेशी चीनी का उपयोग किया जाता उसमें भाग लेने से मेहमान लोग इनकार कर देते थे । स्वदेशी आंदोलनं का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष आत्मनिर्भरता या आत्मशक्ति पर दिया जाने वाला जोर था आत्मनिर्भरता का मतलब था राष्ट्र की गरिमा , सम्मान और आत्मविश्वास की घोषणा आर्थिक क्षेत्र में इसका अर्थ देशी उद्योगों व अन्य उद्यमों को बढ़ावा देना । अनेक कपड़ा मिलें , साबुन और माचिस के कारखाने , हैंडलूम के उद्यम , राष्ट्रीय बैंक और बीमा कंपनियां खुलीं । आचार्य पीसीराय ने प्रसिद्ध बंगाल केमिकल स्वदेशी स्टोर्स की स्थापना की । महान कवि रविंद्रनाथ ठाकुर तक ने एक स्वदेशी स्टोर खुलवाने में सहायता की । संस्कृति के क्षेत्र में स्वदेशी आंदोलन के अनेक परिणाम सामने आए । राष्ट्रवादी काव्य , गद्य और पत्रकारिता का विकास हुआ । इत समय रवींद्रनाथ ठाकुर , रजनीकांत सेन , सैयद अबू मुहम्मद और मुकुंद दास ने देशभक्ति के जो गीत लिखे चे बंगाल में आज भी गाए जाते हैं । उन दिनों आत्मनिर्भरता के लिए और एक रचनात्मक उपाय किया गया वह ए राष्ट्रीय शिक्षा साहित्यिक , तकनीकी और शारीरिक शिक्षा देने के लिए राष्ट्रवादियों ने राष्ट्रीय शैक्षिक संस्थाएं स्थापित कीं क्योंकि वे शिक्षा की तत्कालीन प्रणाली को राष्ट्रवाद से विमुख करने वाली या कम से कम अपर्याप्त मानते थे । 15 अगस्त 1906 को एक राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् की स्थापना की गई । कलकत्ता में एक राष्ट्रीय कालेज का आरंभ हुआ जिसके प्रधानाचार्य अरविंद घोष थे । छात्रों , स्त्रियों , मुसलमानों और जनता की भूमिकाएं : स्वदेशी आंदोलन में एक प्रमुख भूमिका बंगाल के युवकों ने निभाई । उन्होंने स्वदेशी का प्रयोग और प्रधार किया तथा विदेशी वस्त्र बेचने वाली दुकानों के आगे धरने आयोजित करने में आगे - आगे रहे । सरकार ने छात्रों को दबाने की हर संभव कोशिश की । जिन स्कूलों और कालेजों के छात्र स्वदेशी आंदोलन में सक्रिय हों उन्हें दंडित करने के आदेश जारी किए गए , उन्हें प्राप्त सहायताएं व विशेषाधिकार छीन लिए गए , और उन्हें विश्वविद्यालय से असंबद्ध कर दिया गया , उनके छात्रों को छात्रवृति की परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया गया , तथा उन्हें हर सरकारी नौकरी से वंचित रखने का निर्णय किया गया । राष्ट्रवादी आंदोलन में भाग लेने के दोष छात्रों के खिलाफ अनुशासन की कार्रवाइयां की । गईं । अनेकों पर जुर्माने किए गए ; अनेकों स्कूलों व कालेजों से निकाल दिए गए , गिरफ्तार किए गए , और कभी - कभी पुलिस द्वारा लाठियों से पीटे भी गए । फिर भी छात्रों ने झुकने से इंकार कर दिया । स्वदेशी आंदोलन की एक महत्त्वपूर्ण बात इसमें स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी थी । शहरी मध्य वर्ग की सदियों से घरों में कैद महिलाएं जुलूसों और धरनों में शामिल हुईं । इसके बाद से राष्ट्रवादी आंदोलन में वे बराबर सक्रिय रहीं । अनेकों प्रमुख मुसलमान नागरिकों ने भी स्वदेशी आंदोलन में भाग लिया । इनमें प्रसिद्ध वकील अब्दुर्रसूल , लोकप्रिय आंदोलनकारी लियाकत हुसैन और व्यापारी गजनवी प्रमुख थे । मौलाना अबुलकलाम आजाद एक क्रांतिकारी आंतकवादी संगठन में शामिल हुए । फिर भी मध्य और उच्च वर्गों के अनेकों दूसरे मुसलमान आंदोलन से अलग रहे या ढाका के नवाब के नेतृत्व में जिसे भारत सरकार ने 14 लाख रुपयों का एक ऋण दिया था उन्होंने इस आधार पर विभाजन का समर्थन किया कि पूर्वी बंगाल में मुसलमानों को बहुमत होगा । ढाका के नवाब और दूसरों को यह सांप्रदायिक दृष्टिकोण अपनाने के लिए अधिकारियों ने प्रोत्साहित किया । ढाका में भाषण देते हुए लार्ड कर्जन ने कहा कि बंगाल के विभाजन का एक कारण था किं पूर्वी बंगाल के मुसलमानों में ऐसी एकता स्थापित की जाए जैसी कि पुराने मुसलमान सूबेदार और सम्राटों के समय से देखने को नहीं मिली है '
आंदोलन का अखिल भारतीय चरित्र
स्वदेशी और स्वराज की गूंज जल्द ही देश के दूसरे प्रांतों में भी गूंजने लगी । बंबई , मद्रास और उत्तर भारत में बंगाल की एकता के समर्थन में तथा विदेशी मालों के बहिष्कार के लिए आंदोलन चलाए गए स्वदेशी आंदोलन को देश के दूसरे भागों तक पहुंचाने में प्रमुख भूमिका तिलक की रही । तिलक ने जल्द ही समझ लिया कि बंगाल में इस आंदोलन के उभरने के कारण भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास का एक नया अध्याय आरंभ हुआ है । ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनसंघर्ष चलाने तथा आपसी सहानुभूति के बंधन में पूरे देश को बांधने की चुनौती सामने थी , और यह एक अच्छा अवसर था ।
उग्र राष्ट्रवाद का विकास
विभाजन - विरोधी आंदोलन की कमान जल्द ही तिलक , विपिनचंद्र पाल और अरविंद घोष जैसे उग्र राष्ट्रवादियों के हाथों में पहुंच गई । इसके अनेक कारण थे । प्रथम , नरमपंथियों के नेतृत्व में पहले के विरोधी आंदोलन का कोई खास परिणाम नहीं निकला था । यहां तक कि नरमपंथी जिस उदारवादी भारत - सचिव लाई मार्ने से बहुत आशाएं लगाए बैठे थे उसने भी कह दिया कि विभाजन अब एक अंतिम सत्य है जिसे बदला नहीं जा सकता । दूसरे , बंगाल के दोनों भागों , खासकर पूर्वी बंगाल की सरकार ने हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डालने के बड़े प्रयत्न किए । बंगाल में हिंदू - मुस्लिम वैमनस्य के बीज संभवतः इसी समय पड़े । इससे राष्ट्रवादियों का जी खट्टा हो गया । लेकिन जनता को जुझारू और क्रांतिकारी राजनीति की ओर जिस बात ने सबसे अधिक धकेली वह थी सरकार की दमन की नीति खासकर पूर्वी बंगाल की सरकार ने राष्ट्रवादी आंदोलन को दबाने की बहुतकोशिश की स्वदेशी आंदोलन में छात्रों को भाग लेने से रोकने के लिए सरकार के प्रयासों का वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं । पूर्वी बंगाल में सड़कों परं बंदे मातरम् का नारा लगाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया । जनसभाओं को सीमित कर दिया गया और कभी - कभी उनकी अनुमति भी नहीं दी जाती थी । प्रेस पर नियंत्रण के लिए भी कानून बनाए गए । स्वदेशी कार्यकर्ताओं पर मुकद्दमे चलाए गए और उन्हें लंबी - लंबी जेल - सजाएं दी गईं । लाला लाजपत राय अनेक छात्रों को शारीरिक दंड तक दिए गए । 1906 से 1909 के बीच बंगाल की अदालतों में 550 से अधिक राजनीतिक मुकद्दमे आए । बहुत से राष्ट्रवादी समाचार पत्रों पर मुकद्दमे चलाए गए और प्रेस की स्वतंत्रता पूरी तरह समाप्त कर दी गई । अनेक शहरों में सैनिक पुलिस लगा दी गई जहां जनता से उसकी इङ्ग हुईं । मन की सबसे बदनाम मिसालों में से एक है , अप्रैल 1906 में बारीसाल में आयोजित बंगाल प्रांतीय लिस का हमला । ३ को बुरी तरह पीटा गया और सम्मेलन को जबर्दस्ती भंग कर दिया था । दिसंबर 1908 में बंगाल के नौ नेताओं को देश बाहर कर दिया गया इनमें आदरणीय नेता कृष्ण कुमार मित्र और अश्विनी कुमार दत्त भी थे । इसके पहले 1907 में पंजाब के नहरी इलाकों में हुए दंगों के बाद लाला लाजपतराय और सरदार अजीतसिंह देशबाहर कर दिए गए थे । 1908 में महान नेता तिलक को दोबारा गिरफ्तार करके 6 वर्ष जेल की वहशियाना सजा दी गई । मद्रास में चिदंबरम पिल्लै , और आंध्र में हरि सर्वोत्तम रावं तथा दूसरे लोग बंदी बनाए गए । जब उग्र राष्ट्रवादियों ने मोर्चा संभाला तो उन्होंने स्वदेशी और बहिष्कार के अलावा निष्क्रिय प्रतिरोध का आह्वान भी किया । उन्होंने जनता से आग्रह किया कि वह सरकार के साथ सहयोग न करें और सरकारी दालत रतक और विधानमंडलों का बहिष्कार करे , अर्थात् अरविंद घोष के शब्दों में , “ वर्तमान परिस्थितियों में प्रशासन चला सकना असंभव बना दें । ' उग्र राष्ट्रवादियों ने स्वदेशी और विभाजन - विरोधी आंदोलन को जन - आंदोलन बनाने की कोशिश की और विदेशी शासन से मुक्ति का नारा दिया । अरविंद घोष ने खुलकर घोषणा की ने कि " राजनीतिक स्वतंत्रता किसी भी राष्ट्र की प्राण वायु है ? इस तरह बंगाल के विभाजन का प्रश्न गौण हो गया और भारत की स्वतंत्रता का प्रश्न भारतीय राजनीति का केंद्रीय प्रश्न बन गया । उग्र राष्ट्रवादियों ने आत्मबलिदान का आह्वान भी किया कि इसके बिना कोई भी महान उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता । फिर भी यह बात याद रखनी चाहिए कि उग्र राष्ट्रवादी भी जनता को सकारात्मक नेतृत्व देने में असफल रहे । वे आंदोलन चलाने के लिए आवश्यक कुशल नेतृत्व और कुशल संगठन नहीं दे सके । उन्होंने जनता को जागृतं तो कर दिया मगर यह नहीं समझ सके कि जनता की इस नई - नई निकली शक्ति का उपयोग कैसे करें या राजनीतिक संघर्ष के नए रूप क्या हों । निष्क्रिम प्रतिरोध और असहयोग विचार मात्र बनकर रह गए । वे देश की वास्तविक जनता , अर्थात किसानों तक पहुंचने में भी असफल रहे । उनका आंदोलन नगरों के निम्न और मध्य वर्गों तथा जमींदारी तक सीमित रहा । 1908 के अंत तक उनकी राजनीति एकं बंद गली में समा चुकी थी । फलस्वरूप उन्हें दबाने में सरकार काफी हद तक सफल रही । उनका आंदोलन उनके प्रमुख नेता तिलक की गिरफ्तारी का तथा विपिनचंद्र पाल और अरविंद घोष द्वारा सक्रिय राजनीति से सन्यास का धक्का नहीं झेल सका । लेकिन राष्ट्रवादी भावनाओं का उभार दब न सका।जनता सदियों पुरानी नींद से जाग चुकी थी और राजनीति में निर्भीक तथा दिलेर रवैया अपनाना सीख चुकी थी । उसने आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ लिया था और जनता की लामबंदी तथा राजनीतिक कार्रवाई के नए रूपों को समझ लिया था । अब उसे एक नया आंदोलन उभरने की प्रतीक्षा थी । इसके अलावा अपने अनुभव से जनता ने कीमती सबक सीखे । गांधीजी ने बाद में लिखा था कि " विभाजन के बाद जनता ने समझ लिया कि प्रार्थनापत्रों के पीछे कुछ शक्ति भी होनी चाहिए और यह कि उसे कष्ट उठाने में समर्थ बनना चाहिए । वास्तव में विभाजन- विरोधी आंदोलन के कारण भारतीय राष्ट्रवाद में एक महान और क्रांतिकारी परिवर्तन आया । बाद के राष्ट्रीय आंदोलन ने इस पूंजी का खूब उपयोग किया ।
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का विकास
सरकार का दमन और साथ में जनता को कुशल नेतृत्व , देने में नेताओं की असफलता के कारण उपजी कुंठा जैसी बातों ने क्रांतिकारी राष्ट्रवाद को जन्म दिया । बंगाल के युवकों ने देखा कि शांतिपूर्ण प्रतिरोध और राजनीतिक कार्रवाई के सारे रास्ते बंद हैं । हताश होकर उन्होंने व्यक्तिगत बहादुरी के कार्यों और बम की राजनीति का सहारा लिया । अब उन्हें यह भरोसा नहीं रहा था कि निष्क्रिय प्रतिरोध से राष्ट्रवादी उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है । जैसा कि बारीसाल सम्मेलन के बाद समाचार - पत्र ' युगान्तर ने 22 अप्रैल , 1906 को लिखा : “ समस्या का समाधान जनता के अपने हाथों में है । उत्पीड़न के इस अभिशाप को रोकने के लिए भारत के तीस करोड़ लोगों को अपने साठ करोड़ हाथ ऊपर उठाने होंगे । ताकत का सामना ताकत से करना होगा । लेकिन इन क्रांतिकारी युवकों ने जनक्रांति लाने की कोई कोशिश नहीं की । इसके बजाय उन्होंने आयरलैंड के आतंकवादियों और रूसी ध्वंसवादियों की विधियां अपनाने का फैसला किया कि अलोकप्रिय अधिकारियों का वध किया जाए । इस सिलसिले का आरंभ 1897 में ही हो चुका था जब चाफेकर भाइयों ने पूना में दो बदनाम ब्रिटिश अधिकारियों का वध कर डाला था । 1904 में विनायक दामोदर सावरकर ने " अभिनव भारत नाम से क्रांतिकारियों का एक गुप्त संगठन बनाया था । 1905 के बाद अनेक समाचारपत्र क्रांतिकारी आतंकवाद की पैरवी करने लगे थे । इनमें बंगाल के " संध्या ' और " युगांतर तथा महाराष्ट्र के ' काल ' सबसे प्रमुख थे । दिसंबर 1907 में बंगाल के लेफ्टिनेंट गवर्नर को जान से मारने की कोशिश की गई । अप्रैल 1908 में खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी ने मुजफ्फरपुर में एक बग्घी पर बम फेंका जिसमें वे समझते थे कि बदनाम जज , किंग्सफोर्ड बैठा है । बाद में प्रफुल्ल चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए खुद को गोली मार ली , जबकि खुदीराम बोस पर मुकद्दमा चलाकर फांसी दे दी गई । क्रांतिकारी ओलंकवाद का आंदोलन अब आरंभ हो चुका था । आतंकवादी युवकों की अनेक गुप्त संस्थाएं अब बन गई इनमें सबसे प्रमुख थी अनुशीलन समिति जिसके ढाका खंड की ही अकेली 500 शाखाएं थीं । क्रांतिकारी आतंकवादी समितियां जल्द ही देश के दूसरे भागों में भी सक्रिय हो उठीं । उनका हौसला इतना बढ़ चुका था कि जब वायसराय लार्ड हार्डिग्ज दिल्ली में एक सरकारीजुलूस में हाथी पर बैठी था तब उस पर भी उन्होंने बम् फेंका । इस हमले में वायसराय घायल हो गया । क्रांतिकारियों ने अपनी गतिविधियों के केंद्र विदेशों में भी खोले इसकी पहल लंदन में श्यामजी कृष्ण वर्मा , विनायक दामोदर सावरकर और हरदयाल ने की जबकि युरोप में उनके प्रमुख नेता मादाम भीखाजी कामा और अजीतसिंह थे । आतंकवादी आंदोलन भी धीरे - धीरे ठंडा पड़ गया । वास्तव में एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में आतंकवाद की असफलता निश्चित थी । इसने जनता को गतिमान नहीं बनाया और वास्तव में जनता में इसका कोई आधार न था । लेकिन भारत में राष्ट्रवाद के विकास में आतंकवादियों का बहुमूल्य योगदान रहा है । जैसा कि एक इतिहासकार ने कहा है , " उन्होंने हमें अपने मनुजत्य पर गर्व करना फिर से सिखाया । हालांकि राजनीतिक रूप से चेतन अधिकांश लोग आतंकवादियों के राजनीतिक दृष्टिकोण से सहमत न थे , फिर भी ये आतंकवादी अपनी वीरता के कारण अपने देशवासियों में बेहद लोकप्रिय हुए । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ( 1905-1914 ) बंग - भंग - विरोधी आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसः मैडम भीकाजी कामा पर एक गहरा प्रभाव छोड़ा । विभाजन का विरोध करने के लिए राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी भाग एक हो गए । वर्ष 1905 के कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष गोखले ने विभाजन की और कर्जन के प्रतिक्रियावादी शासन की खुलकर निंदा की । राष्ट्रीय कांग्रेस ने बंगाल के स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का भी समर्थन किया । नरमपंथी व गरमपंथी राष्ट्रवादियों के बीच जमकर सार्वजनिक बहसें हुईं और मतभेद उभरे । गरमपंथी स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को बंगाल से बाहर देश में भी फैलाया तथा औपनिवेशिक सरकार के साथ किसी भी रूप में जुड़ने का बहिष्कार करना चाहते थे । नरमपंथी , बहिष्कारं को बंगाल तक और वहां भी केवल विदेशी मालों तक सीमित रखना चाहते थे । वर्ष 1906 में राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए दोनों दलों में अजीत सिंह रस्साकशी हुई । अंत में समझौता दादाभाई नौरोजी के नाम पर हुआ जिन्हें सभी राष्ट्रवादी एक महान देशभक्त मानते थे । दादाभाई ने अपने अध्यक्षीय भाषण में घोषणा की कि भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य " नेट ब्रिटेन या उपनिवेशों की तरह का स्वशासन या स्वराज्य है । इस घोषणा ने राष्ट्रवादियों में बिजली की लहर सी दौड़ा दी । लेकिन राष्ट्रवादी आंदोलन के दोनों भागों के मतभेदों को बहुत समय तक दबाकर नहीं रखा जा सका । अनेक नरमपंथी राष्ट्रवादी घटनाओं के साथ ताल - मेल बिठाकर नहीं चल सके । वे यह नहीं समझ सके कि उनके जिस दृष्टिकोण और जिन विधियों ने पीछे एक ठोस लक्ष्य प्राप्त किया था , अब आगे के लिए पर्याप्त नहीं रह गए थे । वे राष्ट्रीय आंदोलन के नए च तक नहीं पहुंच चुके । ब्रिटिश सरकार ने भी " फूट डालो और राज करो का खेल खूब खेला । उन्होंने गरमपंथी राष्ट्रवादियों का दमन किया तथा इसके लिए उन्होंने नरमपंथी राष्ट्रवादियों को अपने पक्ष में लाने के प्रयल किए । नरमपंथी राष्ट्रवादियों को खुश करने के लिए उन्होंने 1909 के इंडियन कांसिल्स एक्ट के रूप में सांविधानिक सुधारों की घोषणा की ; इसी कानून को 1909 के मार्ले - मिंटो सुधारों के नाम से जाना जाता है । 1911 में सरकार ने बंगाल का विभाजन समाप्त कर देने की घोषणा भी की । पश्चिमी और पूर्वी बंगाल फ़िर से मिला दिए गए तथा बिहार और उड़ीसा नाम से एक प्रांत इससे अलग बना दिया गया । इसी के सॉय केंद्र सरकार की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लाई गई । मार्ले - मिंटो सुधारों में इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल और प्रांतीय परिषदों में चुने हुए सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई । लेकिन ऐसे अधिकांश सदस्यों का चुनावं अप्रत्यक्ष रूप से होना था , अर्थात् इंपीरियल कौंसिल के मामले में प्रातीय परिषदों के द्वारा और प्रांतीय परिषदों के मामले में नगरपालिकाओं और जिला परिषदों द्वारा चुने हुए सदस्यों में कुछ सीटें जमींदारों और भारत में रह में रहें । ब्रिटिश पूंजीपतियों के लिए आरक्षित थीं उदाहरण के लिए , इंपीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल के 68 सदस्यों में 36 अधिकारी होते और 5 ऐसे नामजद सदस्य होते जो अधिकारी न हों । शेष 27 सदस्य चुने हुए होते जिनमें 6 बड़े जमींदारों के और 2 ब्रिटिश पूंजीपतियों के अतिनिधि हो इसके अलावा , सुधार के बाद में ये वरिषदै वास्तविक शक्ति से वंचित होतीं और केवल सलाहकार समितियों को काम करतीं इन सुधारों से ब्रिटिश शाह के लोकतंत्र - विरोध और विदेशी चरित्र में या विदेशियों द्वारा देश के आर्थिक शोषण मैं कोई भी परिवर्तन नहीं आया । वास्तव में भारतीय प्रशासन नै खुलकर कहा कि अगर यह कहा जा रहा हो कि वर्तमान सुधार प्रत्यक्ष या अनिवार्य रूप से भारत में एक संसदीय प्रणाली की स्थापना की ओरहमें ले जाएंगे , तो कम से कम मेरा इनसे कुछ भी लेना देना नहीं होगा । ' भारत - सचिव के रूप में उसका स्थान लेने वाले लार्ड क्रेव ने 1912 में स्थिति और भी साफ कर दी भारत में एक वर्ग ऐसा है जो स्वशासन की आशा लिए हुए है जैसा कि दूसरे डोमिनियनों को दी गई है । मैं भारत के लिए इस तरह का कोई भविष्य नहीं देखता । ' 1909 के सुधारों का वास्तविक उद्देश्य नरमपंथियों को भ्रमित करना , राष्ट्रवादियों में फूट डालना , और भारतीयों के बीच एकता को बढ़ने से रोकना था । इन सुधारों ने अलग - अलग चुनाव मुंडलों की प्रणाली भी आरंभ की । इसमें सभी मुसलमानों को मिलाकर उनके अलग चुनाव क्षेत्र बनाए गए थे और इन क्षेत्रों से केवल मुसलमान ही चुने जा सकते थे । यह काम अल्पसंख्यक मुस्लिम संप्रदाय की सुरक्षा के नाम पर किया गया । पर वास्तव में यह हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डालने और भारत में ब्रिटिश शासन को बनाएं रखने की नीति को ही अंग था । अलग - अलग चुनाव मंडलों की यह प्रणाली इस धारणा पर आधारित थी किहिंदुओं और मुसलमानों के राजनीतिक और आर्थिक हित अलग - अलग हैं । यह एक अवैज्ञानिक धारणा थी , क्योंकि धर्म कभी राजनीतिक या आर्थिक हितों का या राजनीतिक संगठन का आधार नहीं हो सकता । इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रणाली के व्यवहार में बहुत घातक परिणाम निकले । इसने भारत के एकीकर की निरंतर ऐतिहासिक प्रक्रिया में आधा खड़ की यह प्रणाली देश में हिंदू और मुस्लिम , दोनों तरह की संप्रदायिकता के विकास का प्रमुख कारण सिद्ध हुई । मध्यवर्गीय मुसलमानों के शैक्षिक और आर्थिक राष्ट्रवाद की मुख्य धारा में शामिल करने के बजाए , अलग - अलग चुनाव मंडलों की इस प्रणाली ने विकसित होते हुए राष्ट्रवादी आंदोलन से उनके अलगाव को और स्थायी बनाया । इससे अलगाववादी प्रवृतियों को बढ़ावा मिला । इसने हिंदू - मुसलमान , सभी भारतीयों की साझी आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करने